एकीकृत कृषि प्रणाली आर्थिक समृद्धि का नया मॉडल

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वाराणसी संवाददाता।

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह ने कृषि उद्यमिता और एकीकृत कृषि प्रणाली के विकास में संस्थान के योगदान की सराहना की। तीन दिवसीय ग्राफ्टिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए डॉ. संजय सिंह ने 25 प्रगतिशील किसानों का स्वागत किया, जिनमें उत्तर प्रदेश के 18, बिहार के 2, झारखंड के 2 तथा मध्य प्रदेश के 3 किसान सम्मिलित थे। प्रशिक्षण में मीडिया तैयारी, ग्राफ्टिंग तकनीक, हीलिंग प्रक्रिया, अनुकूलन एवं ग्राफ्टेड पौध की रोपाई की व्यापक जानकारी प्रदान की जा रही है। महानिदेशक ने अपने संबोधन में कहा,ग्राफ्टिंग तकनीक किसानों के लिए एक उद्यमशीलता का अवसर है। इस तकनीक से प्रशिक्षित किसान ग्राफ्टेड नर्सरी का व्यवसाय स्थापित कर महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने सब्जी बीज उत्पादन, कम लागत में गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार करने और इस तकनीक को व्यापक स्तर पर फैलाने पर विशेष बल दिया।उप-महानिदेशक डॉ. परमेन्द्र सिंह ने विकसित कृषि-2047 मिशन के संदर्भ में कहा कि उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने उद्यमिता विकास पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने ग्राफ्टिंग तकनीक के तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह तकनीक सब्जियों में रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने, प्रतिकूल मौसम सहन करने की क्षमता विकसित करने और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि करने में सहायक है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार कर अपने क्षेत्र में प्रदर्शन करें। संस्थान द्वारा विकसित और उपकार द्वारा पोषित सब्जी आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल का निरीक्षण करते हुए महानिदेशक ने इसकी व्यापक संभावनाओं की सराहना की। यह मॉडल निदेशक डॉ. राजेश कुमार एवं विभागाध्यक्ष डॉ. नागेन्द्र राय के कुशल मार्गदर्शन में संचालित हो रहा है। प्रधान वैज्ञानिक एवं परियोजना अन्वेषक डॉ. राकेश कुमार दुबे ने विस्तार से बताया कि इस एकीकृत प्रणाली में जलीय सब्जियों का उत्पादन (सिंघारा, कमल, कलमी साग), सब्जी बीज उत्पादन, पशुपालन, मुर्गी पालन, वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन और मधुमक्खी पालन जैसी विविध गतिविधियां समन्वित रूप से की जा रही हैं।
डॉ. दुबे ने आर्थिक लाभ के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि एक एकड़ भूमि पर इस प्रणाली को अपनाने से किसानों को एक रुपये की लागत पर लगभग 6.5 रुपये तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। यह लाभ-लागत अनुपात 1:6.5 कृषि क्षेत्र में अत्यधिक उत्साहजनक है। इस प्रणाली के अंतर्गत केवल आर्थिक लाभ ही नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग, जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण जैसे व्यापक लाभ भी प्राप्त हो रहे हैं। यह प्रणाली विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका को सशक्त बनाने में कारगर सिद्ध हो रही है।

महानिदेशक डॉ. संजय सिंह ने सुझाव दिया कि इस सफल मॉडल को उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी व्यापक स्तर पर विस्तार देना चाहिए। उन्होंने क्लस्टर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अधिकाधिक किसानों तक इस तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करने पर बल दिया।परियोजना के अंतर्गत चयनित किसानों को निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन, व्यावहारिक प्रशिक्षण और समय-समय पर विशेषज्ञों की सलाह उपलब्ध कराई जा रही है। इस अवसर पर डॉ. नागेन्द्र राय (विभागाध्यक्ष), डॉ. ए.एन. सिंह, डॉ. राकेश कुमार दुबे, डॉ. गोविन्द पाल सहित संस्थान के अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी स्टाफ उपस्थित रहे।

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